तोड़ता जा रहा है समस्त बंधन,
मन बावरा खोजता है जाने किसे।
उलझन भरा है, एकाग्र नहीं मन,
सीमा में भला कैसे कोई बांधे इसे।
मन बावरा खोजता है जाने किसे।
उलझन भरा है, एकाग्र नहीं मन,
सीमा में भला कैसे कोई बांधे इसे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-048
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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