कितने प्यारे, कितने मासूम से बन जाते हैं लोग।
जाने कैसे इतना अच्छा नाटक कर पाते हैं लोग।
वही चेहरा-मोहरा, और वही कद-काठी,
फिरभी मगर सर से पांव तक बदल जाते हैं लोग।
जाने कैसे इतना अच्छा नाटक कर पाते हैं लोग।
वही चेहरा-मोहरा, और वही कद-काठी,
फिरभी मगर सर से पांव तक बदल जाते हैं लोग।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-092
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