शाइस्तगी-पाकीज़गी ख़त्म, अब महज़ रस्मों-रिवाज रह गए,
जज़्बात-एहसासात ग़ायब हुए, बेमहक ख़ारज़ार गुलाब रह गए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-229
जज़्बात-एहसासात ग़ायब हुए, बेमहक ख़ारज़ार गुलाब रह गए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-229
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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