ख़्वाब पूरे होते नहीं, फिरभी तुझे ख़्वाबों में सजा रक्खा है।
हक़ीक़त जानके भी, दिल को मैंने मुग़ालते में लगा रखा है।
हक़ीक़त जानके भी, दिल को मैंने मुग़ालते में लगा रखा है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-228
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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