9.2.23

P-186 ऐ अंधेरों, मैं

ऐ अंधेरों, वाकिफ़ हूँ तुमसे,रोज़ मुंह उठाए चले आते हो।
बिगाड़ न पाते तुम कुछ, सुबह मुंह लटकाए चले जाते हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-186

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