ऐ अंधेरों, वाकिफ़ हूँ तुमसे,रोज़ मुंह उठाए चले आते हो।
बिगाड़ न पाते तुम कुछ, सुबह मुंह लटकाए चले जाते हो।
बिगाड़ न पाते तुम कुछ, सुबह मुंह लटकाए चले जाते हो।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-186
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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