कब तक रहेगा बरबाद ऐ दिल,
वक़्त रहते कुछ तो संभल जा।
कब तक रोएगा गुज़रे दौर को,
जहाँ बदला तूभी तो बदल जा।
वक़्त रहते कुछ तो संभल जा।
कब तक रोएगा गुज़रे दौर को,
जहाँ बदला तूभी तो बदल जा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-050
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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