मैं तेरे "ज़हन का एक फ़िज़ूल" सा सवाल रहा,
पर ताज्जुब है तेरे ज़हन में कैसे इतने साल रहा।
पर ताज्जुब है तेरे ज़हन में कैसे इतने साल रहा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-205
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
हालात के वार से भी कभी जड़ से ख़त्म नहीं होता।
क्यूं न हारकर लौट आता मैं,
अपनों से कैसे जीत पाता मैं।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-191
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...