आपका नज़र मिलाना ही क़ातिलाना था,
मुस्कुरा कर कहर क्यों ढहा दिया आपने।
मुस्कुरा कर कहर क्यों ढहा दिया आपने।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-190
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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