बड़ा शातिर है इंसान फ़ितरत से अपनी,
उड़ती पतंग को खींच लेता है ढील देकर।
उड़ती पतंग को खींच लेता है ढील देकर।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-155
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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