हर दम दिल पतंग जैसा रहता है,
किसी की डोर से बंधा सा रहता है,
कटफट जाता है उलझ उलझ कर,
फिरभी बेचारा फड़कता रहता है।
किसी की डोर से बंधा सा रहता है,
कटफट जाता है उलझ उलझ कर,
फिरभी बेचारा फड़कता रहता है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" - Q-082
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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