12.11.22

S-197 ग़लतियों पर ग़लतियाँ मैं

ग़लतियों पर गलतियाँ मैं करता ही चला गया,
काश, कोई बेवफ़ा मुझे पहले मिल गया होता।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-197

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...