2.11.22

S-186 मेरे ये अज़ीज़ ज़ख़्म

मेरे अज़ीज़ ज़ख़्म मुरझाए हुए अच्छे नहीं लगते,
इन्हें भी तरो-ताज़ा रखने लगा हूँ मैं पौधों की तराह।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-186

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