25.2.22

P-068 आप तो बहा

आप तो बहा देते हैं ग़म, आंसुओं के ज़रिए,
हम कहाँ जाएं जिनके आंसू भी सूख गए हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-068

Q-049 मुझे नहीं चाहिए

मुझे नहीं चाहिए चांद-सूरज मेरे दोस्त,
एक झिर्री ही काफ़ी है उजाले के लिए।
गर तुम आजाओ मेरी उदास ज़िंदगी मे,
तो मुझे और क्या चाहिए जीने के लिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-049

24.2.22

M-026 काहे क़ैद

काहे क़ैद में रहते हो,
क़ैद में परिंदे भी नहीं रहते।
क़फ़स को तोड़ डालो,
इंसाँन ज़ंज़ीरों में नहीं रहते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-026

Q-048 इश्क़ ख़ुदा

इश्क़ ख़ुदा से करके देखिए,
वो कभी बेवफ़ा नहीं होता।
सारा जहां हो जाता है बेगाना,
पर वो कभी खफ़ा नहीं होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-048

23.2.22

P-067 इश्क़ खुदा से

इश्क़ खुदा से करिए,
वो बेवफ़ा नहीं होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-067

S-099 हसीनों की

हसीनों की अदालत में सज़ा भी हसीन होती है,
बारबार जुर्म की सज़ा से बड़ी तस्कीन होती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-099


S-098 अपनी अना

अपनी अना पर ज़्यादा फ़िदा मत होना,
हमने देखे हैं अनाबाज़ खाक़ में मिलते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-098

Q-047 बस आपके ही बदलने

बस आपके ही बदलने की देर थी,
रफ्ता-रफ्ता ये ज़माना भी बदल जाएगा।
अब आप पर मुनस्सर है हर शय,
मौसम भी जो चाहेंगे, वैसा ही बदल जाएगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-047


22.2.22

S-097 शायरी, जीने का

शायरी जीने का वसीला ना बन गई होती,
अगर मेरे जज़्बात-ओ-एहसासात न होते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-097

17.2.22

K-004 ख़ुशी की चाहे

ख़ुशी की चाहे कोई वजह हो या न हो,
बेवजाह भी तो ख़ुश रहा जा सकता है।

नहीं आती है जब अंदर से हंसी, 
तो भी तो ऊपर-ऊपर से हंसा जाता है।

मुक़द्दर हाथ मे नहीं है तो क्या हुआ,
ख़ुश दिखने में किसी का क्या जाता है।

वैसे भी तो दर्द बढ़ जाते हैं और भी,
उदासी का सबब जब पूछा जाता है।

मुखपे क्यों न ख़ुशी का श्रृंगार लगा लें,
बेदर्द ज़माने को तो जलाया जा सकता है।

हालात बदलेंगे जब बदलने होंगे "अजनबी"
मुस्कुराने के सिवा, किया क्या जा सकता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  K-004





P-066 ज्ञानी ध्यानी

ज्ञानी ध्यानी कहते हैं, शरीर बूढ़ा होता है, मन नहीं,
ये तो बताए, बूढ़े शरीर मे जवान मन का क्या करे कोई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-066

S-096 मेरे प्यार को

मेरे प्यार को तो हारना ही था,
इकतरफ़ा जो ठहरा वो बेचारा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-096

16.2.22

P-065 बस वक्त के

बस वक्त के एक करवट बदलने की देर है,
इंसाँ की शख्सियत बदलने में देर नहीं होती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-065

K-03 कभी सीमा का

कभी सीमा का उलंघन करना,
कभी सीमा का पालन करना,
कभी सीमा पर घमासान होना,
कभी सीमा पर शांति का होना।

कभी सीमा के अंदर ही रहना,
कभी सीमा को पार कर जाना,
कभी सीमा में बांधना किसी को,
कभी सीमा में खुद बंध जाना।

कभी सीमा को हटा देना, 
कभी सीमा रेखा खींच देना,
कभी सीमा बताना किसी की,
कभी सीमा याद दिला देना।

और कभी सीमा को भूल जाना।
सीमाओं में ही उलझा है ज़माना।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  K-03

P-064 तन्हाईयाँ जब

तनहाइयाँ जब आंखों को रुला देती हैं,
तब यादें अतीत को वर्तमान बना देती हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-064

M-025 ये ज़माना

ये ज़माना कितनी तेज़ी से बदलता है,
जो था महंगा,आज मुफ़्त में मिलता है,
जितनी जद्दोजहद थी मुकाम पाने में,
'अजनबी' आज उतनी ही सरलता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-025

15.2.22

P-063 तीरगी है

तीरगी है मेरे इर्द-गिर्द तो क्या हुआ,
जुगनू भी तो अंधेरों में ही चमकते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-063

Q-046 दरवाज़े पर

दरवाज़े पर अब कोई खटखटाहट होती नहीं,
होती भी है तो कोई शक्ल नज़र आती नहीं,
वो तो बहुत चाहता होगा मुझसे मिलना, मगर
उसकी ज़िद शायद अभी इजाज़त देती नहीं। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-046

13.2.22

P-062 लोगों की बातें

लोगों की बातें सुन कर दिल दहल जाता है,
अल्फ़ाज़ रहते हैं वही, पर लहज़ा बदल जाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-062

12.2.22

M-024 टूट जाता है

टूट जाता है दिल एक ही पल में,
फिर क्यूँ संभाल कर रक्खूँ मैं इसे?
घड़ी घड़ी भागता है उसी के पीछे,
भला कैसे बांध कर रक्खूँ मैं इसे ?

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-024

10.2.22

M-023 मैं नहीं शुमार

मैं नहीं शुमार ज़रदारों में, 
मेरी मांग नहीं बाज़ारों में,
मेरी ख़ता क्या है  इसमें,
न गिनो मुझे ख़तावारों मे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-023

8.2.22

S-095 उनको भी है

उनको भी है दरकार आज मुहब्बतों की,
जिन्हें खुन्नसें जताने से फ़ुर्सत नहीं मिलती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-095


S-094 आज मुझे

आज मुझे मेरी बर्बादी का इल्हाम हुआ है,
उसके चेहरे पर आज वही खुशी देखी मैने।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-094


Q-045 ग़लत कहा था

ग़लत कहा था उस नजूमी ने,
कि यह साल बहुत अच्छा है।
हमें ख़ाक में मिलते देख कर,
दुश्मनों का मिजाज़ अच्छा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-045

T-016 बड़े खुदगर्ज़

बड़े खुदगर्ज़ सयाने हैं हम, 
जिस सज़ा के हकदार खुद हैं, 
वो दूसरों को दे देते हैं हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-016


7.2.22

S-093 आंखें तेरी मुन्तज़िर

आंखें तेरी मुन्तज़िर रहेंगी, सांस जाते-जाते,
तू कितनी भी देर कर दे मेहरबाँ आते-आते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-093

S-092 उतार दिए

 उतार दिए ज़ेवराते-इश्क बदन से,
"कब तलक जिस्म को सजाते हम"

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-092

P-061 कहानी तो कब की

कहानी कब की खत्म हो गई होती,
मगर हम हैं कि खत्म होने नहीं देते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-061


6.2.22

P-060 जब आंखों में तो

जबआंखों में तो हर वक्त समाये रहते हो,
फिर पर्दे के पीछे क्यूँ मुंह छिपाए रहते हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-060

P-059 मोहब्बतें होतीं

मुहब्बतें होतीं तो लुटा भी देता,
अब इन नफरतों को क्या करूं।

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-059

5.2.22

T-015 थक गया हूँ

थक गया हूँ, बड़ा लंबा था सफ़र,  
हवेली से निकल गैरेज में बसने का!
जाने कितना है क़याम यहां भी रहने का।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-015

4.2.22

P-058 घोंसला बन जाता है

घोंसला बन जाता है और बस भी जाता है,
तिनके कहाँ से आएंगे, सोचा नहीं जाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-058

P-057 कोई दे जाता है

कोई दे जाता है दर्द, तो रख लेता हूँ,
अपनों की निशानियां समझ लेता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-057

3.2.22

M-022 नज़र में रहा करो

नज़र में रहा करो, बिछड़ों मत यारों,
फिर मिले तो पहचाने नहीं जाएंगे हम।
न जाने कौन कहाँ होगा, के ना होगा,
उम्र हो जाएगी ठिकाने नहीं पाएंगे हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-022

S-091 बेइंतहा शरीफ़

बेइंतहा शरीफ़ लोग मुझे अच्छे लगते हैं,
बदनाम जब कभी वो मुझे करने लगते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-091

Q-044 अपने ही ग़मों

अपने ही ग़मों के ख़ुमार में हैं,
किसी ख़ुशी से होश में नहीं आएंगे हम।
अंधेरों के बाशिंदे हैं 'अजनबी',
नज़र रौशनी के आगोश में नहीं आएंगे हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-044

2.2.22

Q-043 न कर ज़िद

न कर ज़िद उसे पाने की जो किस्मत में नहीं,
जैसे तैसे पा भी लिया अगर, तो खोना पड़ेगा। 
न किया कर मजबूर उसे हंसने को 'अजनबी'',
तन्हाई में फिर बहुत देर तक उसे रोना पड़ेगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-043

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...