थक गया हूँ, बड़ा लंबा था सफ़र,
हवेली से निकल गैरेज में बसने का!
जाने कितना है क़याम यहां भी रहने का।
हवेली से निकल गैरेज में बसने का!
जाने कितना है क़याम यहां भी रहने का।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-015
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
No comments:
Post a Comment