ख़ुशी की चाहे कोई वजह हो या न हो,
बेवजाह भी तो ख़ुश रहा जा सकता है।
बेवजाह भी तो ख़ुश रहा जा सकता है।
नहीं आती है जब अंदर से हंसी,
तो भी तो ऊपर-ऊपर से हंसा जाता है।
मुक़द्दर हाथ मे नहीं है तो क्या हुआ,
ख़ुश दिखने में किसी का क्या जाता है।
वैसे भी तो दर्द बढ़ जाते हैं और भी,
उदासी का सबब जब पूछा जाता है।
मुखपे क्यों न ख़ुशी का श्रृंगार लगा लें,
बेदर्द ज़माने को तो जलाया जा सकता है।
हालात बदलेंगे जब बदलने होंगे "अजनबी"
मुस्कुराने के सिवा, किया क्या जा सकता है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-004
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