23.2.22

S-099 हसीनों की

हसीनों की अदालत में सज़ा भी हसीन होती है,
बारबार जुर्म की सज़ा से बड़ी तस्कीन होती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-099


No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...