24.2.22

M-026 काहे क़ैद

काहे क़ैद में रहते हो,
क़ैद में परिंदे भी नहीं रहते।
क़फ़स को तोड़ डालो,
इंसाँन ज़ंज़ीरों में नहीं रहते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-026

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