काहे क़ैद में रहते हो,
क़ैद में परिंदे भी नहीं रहते।
क़फ़स को तोड़ डालो,
इंसाँन ज़ंज़ीरों में नहीं रहते।
क़ैद में परिंदे भी नहीं रहते।
क़फ़स को तोड़ डालो,
इंसाँन ज़ंज़ीरों में नहीं रहते।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-026
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
No comments:
Post a Comment