8.2.22

S-095 उनको भी है

उनको भी है दरकार आज मुहब्बतों की,
जिन्हें खुन्नसें जताने से फ़ुर्सत नहीं मिलती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-095


No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...