31.10.22

Q-079 ज़मीन पर तुम

ज़मीन पर तुम इस कदर कींचड़ न उछालो यार,
थोड़ी देर उड़े क्या, आसमान सर पर न उठा लो यार,
ज़मीन की होती है दरकार उड़ने को, गिरने को,
ज़मीन को तुम अपना दुश्मन न बना लो यार।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-079

S-184 न तो वक़्त उनका है

न तो वक़्त उनका है न ज़माना  उनका है,
मस्लहत से भरा दिलो-दिमाग़ जिनका है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-184


S-183 चोट की शक्लो-ज़ुबाँ

चोट की शक़्लो-ज़ुबाँ नहीं होती,
कितनी है गहरी बयाँ नहीं होती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-183

30.10.22

M-040 सूखकर खड़ंक

सूखकर खड़ंक हो जाते हैं पत्ते,
टूटकर ज़मीं पर गिर जाते हैं पत्ते,
निराश नहीं होतीं शजर की शाखाएं,
वो जानती हैं फिर नए आ आते हैं पत्ते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-040

29.10.22

S-182 इश्क़ में कैसी

इश्क़ में कैसी अजीब सी होती है बात,
आख़री कहके हर बार ही होती है बात।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-182

27.10.22

P-152 इतनी न करो

इतनी न करो अदावत कि फिर बात बननी मुश्किल हो जाए,
ज़मीर को न गिराओ इतना, कि आंख उठनी मुश्किल हो जाए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-152

P-151 हमे तो ज़रा

हमें तो ज़रा से दीदार का भी हक़ नहीं देते,

ख़ुद हमारे ख़्वाबों-ख्यालों में छाए रहते हो।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-151


26.10.22

S-181 लौट-लौट कर

लौट लौट कर आ जाते हैं ज़िन्दगी में,
के अब अंधेरे भी डरते नहीं उजालों  से।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S -181

P-150 जबसे इस दिल

जब से इस दिल की ये हालत हो गई,
ख़त्म अरमाँ पालने की आदत हो गई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-150

P-149 रूठ जाते हैं

रूठ जाते हैं, टूट जाते हैं, छूट जाते हैं दोस्त,
प्यार की तराह मगर बेवफ़ा नहीं हो जाते हैं दोस्त।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-149

22.10.22

S-180 मुझे क्यों हो

मुझे क्यों हो ग़म भला तुझसे जुदाई  का, 
तेरी तस्वीर जब है इलाज मेरी तन्हाई का।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-180

21.10.22

P-148 कभी पास होके

कभी पास होके भी इतने क़रीब न रहे  हम,

होकर जुदा जितने नज़दीक हैं आ गए हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-148

P-147 जब दुनियाँ छोड़

जब दुनियाँ छोड़ देती है तन्हा, 
ग़म ही हैं जो साथ देते हैं वहां।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-147

S-179 तुझे मुझसे मुहब्बत

तुझे मुझसे मुहब्बत है तब तलक,
मैं तेरे काम की चीज़ हूँ जब तलक।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-179 

20.10.22

S-178 उस वक़्त ज़िन्दगी

उस वक़्त ज़िन्दगी में बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है,
जब चोट देने वाले को ख़ुद भी चोट खानी पड़ती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-178

S-177 जब तेरे दिए ज़ख्म

जब तेरे दिए ज़ख्म ही मुझे अज़ीज़ हैं,
तो फिर क्यों न हो मुझे तेरी आरज़ू।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-177

P-146 इंसान जब भावनाओं

इंसान जब भावनाओं  का दास होता है,
तभी जीवन मे वो निराश व उदास होता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-146

17.10.22

P-145 सुन, मैंने तेरी तलाश

मैंने तेरी तलाश अब बन्द कर दी है,
तू कहीं खोई न थी, बस बदल गई है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-145

16.10.22

Q-078 ये वक़्त निकला

वक़्त निकला जा रहा है कुछ इस तराह,
धूल उड़ाता जाता हो कारवां जिस तराह।
ख़ामोश,तन्हा,बेज़ुबां से हो गए हैं लोग यूं,
इल्म नहीं है कौन जी रहा है किस तराह।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-078

P-144 अच्छा होता

अच्छा होता अगर ये हिचकियाँ न
होतीं,
हमे भूल जाने में उसे दुश्वारियाँ
तो न होतीं ।

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-144

Q-077 मालूम है लौटके

मालूम है लौटके नहीं आएगा वक़्त,
बहुत है बेमुरव्वत और बेवफ़ा वक़्त,
मगर वो इतना भी नहीं गया-गुज़रा,
जो ज़ख्मों को न भर पाएगा वक़्त।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-077

15.10.22

P-143 अभी के लिए तो

अभी के लिए तो,  इतने ही काफ़ी हैं ग़म,
मांग लूंगा तुमसे और, जब भी लगेंगे कम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-143

P-142 ज़माने की निगाह में

ज़माने की निगाह में गिरने की परवाह ना सही,
पर नज़रे-ख़ुद में तो शर्मिंदगी का डर लाज़िम है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-142

13.10.22

T-025 'अपने' डुबा देते हैं

जब 'अपने' डुबा देते हैं, गैर बचा लेते हैं,
ऐसे अपनों से तो 'अजनबी' ही अच्छे,
जो इंसानियत का हाथ तो बढ़ा देते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-025

T-024 मैं जानता हूँ

मैं जानता हूँ कि लौट कर वो नहीं आएगा,
बहुत गया-गुज़रा है वो, बड़ा बेवफ़ा है वो, 
मैं हार जाऊंगा 'वक़्त' से, पर वो नहीं आएगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-024

12.10.22

S-176 इश्क़ तो यूंही

इश्क़ तो यूंही बदनाम है, 
धोखा तो लोग दोस्ती में भी खाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-176

11.10.22

P-141 सोचा ही नहीं

सोचा ही नहीं बदल जाना कुदरत का नियम है,

ख़ामे-खां गिले शिकवे लोगों से करते चले गए हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-141

8.10.22

S-175 मुझ को मालूम है

मुझ को मालूम है, चंद घंटों का ही सवेरा है,
जीस्त में लौट के आना तो फिर वही अंधेरा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-175

7.10.22

S-174 बदली बदली सी

बदली बदली सी तेरी तस्वीर नज़र आती है,
बंद होती शायद मेरी तक़दीर नज़र आती है।

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-174

6.10.22

Q-076 मैं वाकिफ़ हूँ

मैं वाकिफ़ हूँ तेरे दर्द से, 
मगर मेरे दर्द भी तुझसे कम नहीं।
मैं मुस्कुराता रहता हूँ यूंही,
वरना ये न समझ मुझे कोई ग़म नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-076

1.10.22

P-140 मुझे हक़ है

मुझे हक़ है अपने बारे में कोई भी ग़लतफ़हमी पाल लूं, 
पर फ़र्ज़ भी है उसके दूर होने पे अपनी ग़लती मान लूं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-140
                 

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...