31.10.22

S-183 चोट की शक्लो-ज़ुबाँ

चोट की शक़्लो-ज़ुबाँ नहीं होती,
कितनी है गहरी बयाँ नहीं होती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-183

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...