30.10.22

M-040 सूखकर खड़ंक

सूखकर खड़ंक हो जाते हैं पत्ते,
टूटकर ज़मीं पर गिर जाते हैं पत्ते,
निराश नहीं होतीं शजर की शाखाएं,
वो जानती हैं फिर नए आ आते हैं पत्ते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-040

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...