सूखकर खड़ंक हो जाते हैं पत्ते,
टूटकर ज़मीं पर गिर जाते हैं पत्ते,
निराश नहीं होतीं शजर की शाखाएं,
वो जानती हैं फिर नए आ आते हैं पत्ते।
टूटकर ज़मीं पर गिर जाते हैं पत्ते,
निराश नहीं होतीं शजर की शाखाएं,
वो जानती हैं फिर नए आ आते हैं पत्ते।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-040
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