वक़्त निकला जा रहा है कुछ इस तराह,
धूल उड़ाता जाता हो कारवां जिस तराह।
ख़ामोश,तन्हा,बेज़ुबां से हो गए हैं लोग यूं,
इल्म नहीं है कौन जी रहा है किस तराह।
धूल उड़ाता जाता हो कारवां जिस तराह।
ख़ामोश,तन्हा,बेज़ुबां से हो गए हैं लोग यूं,
इल्म नहीं है कौन जी रहा है किस तराह।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-078
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