इतनी न करो अदावत कि फिर बात बननी मुश्किल हो जाए,
ज़मीर को न गिराओ इतना, कि आंख उठनी मुश्किल हो जाए।
ज़मीर को न गिराओ इतना, कि आंख उठनी मुश्किल हो जाए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-152
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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