मालूम है लौटके नहीं आएगा वक़्त,
बहुत है बेमुरव्वत और बेवफ़ा वक़्त,
मगर वो इतना भी नहीं गया-गुज़रा,
जो ज़ख्मों को न भर पाएगा वक़्त।
बहुत है बेमुरव्वत और बेवफ़ा वक़्त,
मगर वो इतना भी नहीं गया-गुज़रा,
जो ज़ख्मों को न भर पाएगा वक़्त।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-077
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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