मैं वाकिफ़ हूँ तेरे दर्द से,
मगर मेरे दर्द भी तुझसे कम नहीं।
मैं मुस्कुराता रहता हूँ यूंही,
वरना ये न समझ मुझे कोई ग़म नहीं।
मगर मेरे दर्द भी तुझसे कम नहीं।
मैं मुस्कुराता रहता हूँ यूंही,
वरना ये न समझ मुझे कोई ग़म नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-076
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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