30.6.23

G-013 जब सभी स्त्रोत

जब सभी स्त्रोत हो चुके थे बन्द,
तो मुझे ये ऊर्जा कहाँ से मिल रही है।

ज़िन्दगी अंधेरों में थी अब तक मेरी,
फिर ये रोशनी कहाँ से मिल रही है।

कोई बिरवा रोपा होगा वर्षों पहले,
अब जाके कली उसपे खिल रही है।

अब क्यों लगने लगी ज़िन्दगी प्यारी,
ऐसी कौनसी ख़ुशी उसे मिल रही है।

खोल दिया अपना दिल बहार ने भी,
वर्ना तो बहार मुझपे तंगदिल रही है।

ये कैसा दिलकश मंज़र है "अजनबी"
कि धरती अब आसमाँ से मिल रही है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  G-013

29.6.23

M-067 काश मैं एक

काश मै एक गीत होता,
अक्सर गुनगुना लिया करतीं तुम मुझे,
पर मै तो एक कहानी हूँ,
जल्दी पढ़के तुमने कर दिया ख़त्म मुझे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-067

S-273 मेरी शायरी में

मेरी शायरी में ठहराव बहुत हैं, रफ़्तार नहीं है, 
मेरे  ख़्यालात  हैं  जितने, उतने इज़हार नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-273

S-272 अपनी होके ही रहेगी

अपनी होके ही रहेगी वो शय, गर लिखी है लकीरों में,
नादाँ हैं वो, जो उसे बांध कर रखते हैं ज़ंजीरों में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-272

Q-122 झुलसाती गर्मी में

झुलसाती गर्मी में अगर थोड़ी बरसात हो,
दर्द भरी इस तन्हाई में अगर तेरा साथ हो,
ज़ुबां से काम लेने की फिर क्या ज़रूरत,
आँखों ही आँखों में जब दिल की बात हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-122

25.6.23

Q-121 लड़ता रहा माकूल थे

लड़ता रहा माकूल थे जबतक हालात मेरे।
मगर बहुत बदल गए हैं  अब ख़्यालात मेरे।
ज़माने में वो पहले जैसा तवाज़ुन रहा नहीं,
हार-थक कर अब सो गए हैं  जज़्बात मेरे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-121

P-217 माना कि अपने अज़ीज़

माना कि अपने अज़ीज़ कभी भुलाए नहीं जा सकते, मगर
जाने के बाद सदियों उन्हें हम रोते भी तो नहीं जा सकते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-217

23.6.23

Q-120 तन्हा सिर्फ़ हम ही

तन्हा सिर्फ़ हम ही नहीं,
हैं तो हैं, ये ग़म भी नहीं,
दर्द तो बस इतना है हमे,
तन्हा कम तुम भी नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा ""अजनबी" Q-120

20.6.23

K-008 खो चुका हूँ अस्तित्व

खो चुका हूँ मै अस्तित्व अपना,
फिर भी सपने संजोये मै बैठा हूँ।
 
 संभावनाएं  हो गईं  हैं समाप्त,
 फिर भी  उन्हीं  पे मै जीता हूँ।
 
ना जाने क्यों है अन्धविश्वास,
क्यों स्वयं को धोखे मै देता हूँ।
 
फिर सूरज डूबा,  फिर शाम हुई,
फिर सुबह की बाट मै जोहता हूँ।

बंजर भाग्य में कुछ अंकुरित न हुआ,
फिर भी बीज आशा के मै बोता हूँ।

बहारों ने मुंह मोड़ लिया कबसे,
फिर भी इंतज़ार में  मैं बैठा हूँ।

खो चुका हूँ  मै अस्तित्व अपना, 
फिर  भी सपने  संजोये मै बैठा हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-008

P-216 अब तो बहुत ही छोटी

अब तो बहुत ही छोटी मुस्कान होठों पर आती है,
वो भी बन्द हो जाती है जब फ़ोटो खिंच जाती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-216

19.6.23

M-066 इंसाँ थक जाता है

इंसाँ थक जाता है अच्छा रहकर भी, बुरा रह कर भी,
थक जाता है ज़ुल्म कर कर भी, ज़ुल्म सह सह कर भी।
मगर ज़िन्दगी में संतुष्ट सिर्फ वही इंसाँ है जो,
अपनी-अपनी करता है, थकता नहीं ढीट रह कर भी।

-वीरेंद्र स "अजनबी" M-066

18.6.23

P-215 धरा को "धरा"

धरा को "धरा" शायद इसलिए कहा जाता है,
इंसाँ का सबकुछ इसी पे धरा का धरा रह जाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-215

P-214 भगवान इन्सान को

भगवान इन्सान को चाहे कुछ और गुण देता या न देता,
कम से कम भावनाओं को समझने की ताकत तो देता।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" P-214


17.6.23

Q-119 संगदिलों का सरोकार

संगदिलों का सरोकार शायरी से है नहीं,
और ऐसे मौकापरास्तों का शायर मै नहीं,
वाह-वाह करेंगे कैसे मेरी शायरी पर वो,
जज़्बा-ऐ-मुहब्बत जिनमे क़तई  है नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-119

Q-118 दोस्त अगर बेगाना हो

दोस्त अगर बेगाना भी हो जाय कभी,
तो भी वो तसव्वुर में हमेशा रहता है।
उम्मीद न रह गई हो उसके आने की,
हसीन इम्कान फिर भी बना रहता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-118

M-065 उसने सही कहा,

सही कहा, लोग ग़लतफ़हमियों का शिकार हो जाते हैं,
मै भी दोस्ती में, एक ग़लतफ़हमी का शिकार हो चुका हूँ।
मैंने सुन रखा था, झगड़ा करने से प्यार बढ़ जाता है,
पर झगड़ा करके, मै तो रहा सहा भी प्यार खो चुका हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-065

S-271 मेरे ग़मों को ना

मेरे ग़मों को ना कुरेदो, बचा खुचा होंसला भी हवा हो जायगा,
मेरी बर्बादियों का वाईस न पूछो, मेरा दोस्त रुसवा हो जायगा।

 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-271

16.6.23

M-064 आज मुझे कुछ

आज मुझे कुछ अलग अनुभूति हो रही है।
मेरे विचारों की दिशा परिवर्तित हो रही है।
निराशाओं में, आशाओं का हो रहा मिश्रण,
भावों में आशावादिता, प्रस्फुटित हो रही है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-064

P-213 इंसाँ कठपुतली है

इंसाँ कठपुतली है अदृश्य शक्तियों की,
चल देता है वहां, डोरियाँ जहां घुमा देती हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-213

K-006 गिरती हुई ये बरसात

गिरती हुई ये बरसात,

बिलकुल जैसे मेरे जज़्बात।

बूँदें जब तक आकाश में,

स्वच्छ,निर्मल, कोमल।

पर गिरकर धरा पर ये,

बन जातीं हैं कींचड़।

मैला गन्दगी से मिलकर,

खो देतीं समस्त सौंदर्य,

बन जातीं हैं कुरूप ये।


उसी तरह मेरे जज़्बात, 

जब तक हैं,मेरे पास, 

तबतक बड़े पाक-साफ।

लुटा देता हूँ जब मै उन्हें,

हो जातें हैं वो मैलेकुचेले,

टूटे फूटे और कटे-फटे।

बड़े सस्ते और फ़िज़ूल से,

दो कौड़ी मूल्य के।

कोई कद्र्दान् नहीं,

कोई उपयोग नहीं,

उपेक्षित निकृष्ट हैं हो जाते,

नितांत अकेले, मेरे जज़्बात।

 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-006


15.6.23

Q-117 सेंटीमेंट्स को मारने

सेंटीमेंट्स को मारने की कोई दवा है क्या?
मेरे दिल में बहुत सेंटीमेंट्स हो गए हैं।
अगाहे बगाहे मार देता हूँ मैं इन्हें, मगर
बारबार पैदा हो जाते हैं, बड़े ढीठ हो गए हैं। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-117

14.6.23

P-080 खूबसूरती चाहे

ख़ूबसूरती चाहे नक़ली हो, पर दिल को भा जाती है।
तारीफ़ चाहे झूंटी ही हो, मगर सब को भा जाती है।

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-080

12.6.23

M-063 लीन हो जाता हूँ

लीन हो जाता हूँ संवेदनाओं में, मैं
बह क्यों जाता हूँ भावनाओं में, मैं
विस्तार क्यों देता हूँ आशाओं को,
बंध क्यों नहीं जाता सीमाओं में, मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-063

10.6.23

Q-116 मुहब्बत गुस्से में ही

मुहब्बत बोलने से ही नहीं हो जाती,
ख़ामोशी से भी हो जाया करती है।
अदावत गुस्से में ही नहीं हो जाती,
बहुत प्यार में भी हो जाया करती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-116

4.6.23

P-212 सबसे बड़ा कसूर,

सबसे बड़ा कसूर , सबसे बड़ी सज़ा है,
किसी को सफ़ाई देने से महरूम कर देना। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-212

2.6.23

S-270 ज़रा यकीन रख

ज़रा यकीन रख 'अजनबी' मंज़िल कहीं मिलेगी ज़रूर,
जब ये रास्ते बने हैं तो मंज़िल भी कहीं दिखेगी ज़रूर।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-270

1.6.23

P-211 तस्वीर हटा दी

तस्वीर  हटा दी मेरी,तसव्वुर से हटा दो तो जानूं।
दिल से मिटा दिया मुझे,यादों से मिटा दो तो जानूं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-211

P-210 संघर्ष करना है तो

संघर्ष करना है कठिन,पर प्रसाद मिलता ज़रूर है।
इंसा हो पत्थरदिल,पर कभी न कभी पिंघलता ज़रूर है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-210

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...