19.6.23

M-066 इंसाँ थक जाता है

इंसाँ थक जाता है अच्छा रहकर भी, बुरा रह कर भी,
थक जाता है ज़ुल्म कर कर भी, ज़ुल्म सह सह कर भी।
मगर ज़िन्दगी में संतुष्ट सिर्फ वही इंसाँ है जो,
अपनी-अपनी करता है, थकता नहीं ढीट रह कर भी।

-वीरेंद्र स "अजनबी" M-066

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