इंसाँ थक जाता है अच्छा रहकर भी, बुरा रह कर भी,
थक जाता है ज़ुल्म कर कर भी, ज़ुल्म सह सह कर भी।
मगर ज़िन्दगी में संतुष्ट सिर्फ वही इंसाँ है जो,
अपनी-अपनी करता है, थकता नहीं ढीट रह कर भी।
थक जाता है ज़ुल्म कर कर भी, ज़ुल्म सह सह कर भी।
मगर ज़िन्दगी में संतुष्ट सिर्फ वही इंसाँ है जो,
अपनी-अपनी करता है, थकता नहीं ढीट रह कर भी।
-वीरेंद्र स "अजनबी" M-066
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