लीन हो जाता हूँ संवेदनाओं में, मैं
बह क्यों जाता हूँ भावनाओं में, मैं
विस्तार क्यों देता हूँ आशाओं को,
बंध क्यों नहीं जाता सीमाओं में, मैं।
बह क्यों जाता हूँ भावनाओं में, मैं
विस्तार क्यों देता हूँ आशाओं को,
बंध क्यों नहीं जाता सीमाओं में, मैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-063
No comments:
Post a Comment