जब सभी स्त्रोत हो चुके थे बन्द,
तो मुझे ये ऊर्जा कहाँ से मिल रही है।
तो मुझे ये ऊर्जा कहाँ से मिल रही है।
ज़िन्दगी अंधेरों में थी अब तक मेरी,
फिर ये रोशनी कहाँ से मिल रही है।
कोई बिरवा रोपा होगा वर्षों पहले,
अब जाके कली उसपे खिल रही है।
अब क्यों लगने लगी ज़िन्दगी प्यारी,
ऐसी कौनसी ख़ुशी उसे मिल रही है।
खोल दिया अपना दिल बहार ने भी,
वर्ना तो बहार मुझपे तंगदिल रही है।
ये कैसा दिलकश मंज़र है "अजनबी"
कि धरती अब आसमाँ से मिल रही है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-013
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