यूंतो जलता चराग़ हूँ पर बुझा-बुझा सा रहता हूँ मैं,
रोशनी देकर भी अंधेरों से डरा-डरा सा रहता हूँ मैं,
मुख़्तसर सी मोहलत मुझको देते हैं आंधी तूफ़ान,
वर्ना तो रातभर सहमा टिम-टिमाता सा रहता हूँ मैं।
रोशनी देकर भी अंधेरों से डरा-डरा सा रहता हूँ मैं,
मुख़्तसर सी मोहलत मुझको देते हैं आंधी तूफ़ान,
वर्ना तो रातभर सहमा टिम-टिमाता सा रहता हूँ मैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-123
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