20.6.23

K-008 खो चुका हूँ अस्तित्व

खो चुका हूँ मै अस्तित्व अपना,
फिर भी सपने संजोये मै बैठा हूँ।
 
 संभावनाएं  हो गईं  हैं समाप्त,
 फिर भी  उन्हीं  पे मै जीता हूँ।
 
ना जाने क्यों है अन्धविश्वास,
क्यों स्वयं को धोखे मै देता हूँ।
 
फिर सूरज डूबा,  फिर शाम हुई,
फिर सुबह की बाट मै जोहता हूँ।

बंजर भाग्य में कुछ अंकुरित न हुआ,
फिर भी बीज आशा के मै बोता हूँ।

बहारों ने मुंह मोड़ लिया कबसे,
फिर भी इंतज़ार में  मैं बैठा हूँ।

खो चुका हूँ  मै अस्तित्व अपना, 
फिर  भी सपने  संजोये मै बैठा हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-008

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