संघर्ष करना है कठिन,पर प्रसाद मिलता ज़रूर है।
इंसा हो पत्थरदिल,पर कभी न कभी पिंघलता ज़रूर है।
इंसा हो पत्थरदिल,पर कभी न कभी पिंघलता ज़रूर है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-210
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
No comments:
Post a Comment