कहने को तो मैं "अजनबी" हूँ,
पर ये सोचो ये कहता कौन है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-209
पर ये सोचो ये कहता कौन है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-209
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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