गिरती हुई ये बरसात,
बिलकुल जैसे मेरे जज़्बात।
बूँदें जब तक आकाश में,
स्वच्छ,निर्मल, कोमल।
पर गिरकर धरा पर ये,
बन जातीं हैं कींचड़।
मैला गन्दगी से मिलकर,
खो देतीं समस्त सौंदर्य,
बन जातीं हैं कुरूप ये।
उसी तरह मेरे जज़्बात,
जब तक हैं,मेरे पास,
तबतक बड़े पाक-साफ।
लुटा देता हूँ जब मै उन्हें,
हो जातें हैं वो मैलेकुचेले,
टूटे फूटे और कटे-फटे।
बड़े सस्ते और फ़िज़ूल से,
दो कौड़ी मूल्य के।
कोई कद्र्दान् नहीं,
कोई उपयोग नहीं,
उपेक्षित निकृष्ट हैं हो जाते,
नितांत अकेले, मेरे जज़्बात।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-006
No comments:
Post a Comment