ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
30.6.21
S- 023 हम इश्क के
29.6.21
S-019 ज़िन्दगी मैं तुझे
वक्त ने मुझे कुछ लम्हों से ज़्यादा दिया ही नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-019
G-001 ऐ वक्त तुझे
कभी आदमी भी देख लिया कर ज़ुल्म ढाने से पहले।
कभी बुरा बन के आता है तो कभी अच्छा बनके तू,
कभी तो कुछ बतला दिया कर, अपने आने से पहले।
कितने ही बेकसूर चुप बैठ जाते हैं तेरी मार खाकर,
ये तो दोहरी मार है, पूछ क्यों नहीं लेता मारने से पहले।
खुदभी बदल जाता है और बदल देता है इंसानों को तू,
आपस मे लड़ने लगते हैं लोग सच्चाई जानने से पहले।
जाने कब वफ़ादार, जाने कब बेवफ़ा हो जाता है तू,
काश इंसाँ तूझे पहचान लिया करता तेरे आने से पहले।
28.6.21
Q-014 कुदरत का कानून
27.6.21
S-024 ग़मज़दा को भला
ग़मज़दा को भला और भी ग़मज़दा हम क्यों करें,
वक़्त भर देगा ज़ख्म, उसे और हरा हम क्यों करें।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-024
S-022 बहुत ढका रह लिया
26.6.21
S- 021 अब हम नहीं
अब हम नहीं लुटाते जज़्बात, उनकी क़दर करते हैं।
पहले करते थे मुहब्बत आपसे, अब खुद से करते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-021
25.6.21
S- 020 तीरगी दूर
23.6.21
Q- 013 बेशक ज़माना भी
बेशक ज़माना भी बन जाता है दुश्मन कभी-कभी,
कुछ लोग भी हैं जो ज़माने को दुश्मन बना लेते हैं।
रखते हैं तल्खियाँ भी, तमाम तवक्को भी ज़माने से,
पर इसी पे इल्ज़ाम, इसी पे तोहमतें वो लगा देते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-013
21.6.21
P-009 उदासियों में
उदासियों में लोग ऐसे उदासीन हो गए हैं,
मानो, हृदयहीन ,भावनाविहीन हो गए हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-009
Q- 012 और ज़्यादा तंग
और ज़्यादा तंग न कर ज़िन्दगी,
इतना घमंड भी न कर ज़िन्दगी,
हमने रोज़ तेरे जैसी हज़ारों को,
यूंही दम तोड़ते देखा है ज़िन्दगी।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-012
S-018 मुहब्बत में भला
20.6.21
Q-011 रहने दो यार
19.6.21
P-008 सोचो अगर
सोचो अगर आईना दिखाने वाला कोई न हो,
तो लोग अपने बारे में कुछ जान ही न पाएँगे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-008
16.6.21
S-017 यूं तो चिराग़ हूँ
M-007 है अगर भीड़
है अगर भीड़ संसद से ऊपर,
तो सदनों को भंग क्यों नहीं किया जाता।
है अगर फ़ैसला उपद्रवियों के हाथ मे,
तो संविधान निरस्त क्यों नहीं किया जाता।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-007
P-007 वो इंसाँ अपनी
वो इंसाँ अपनी ज़िंदगी भला जियेगा कब,
जिसे सुख में और दुख में जीना न आया।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-007
13.6.21
P-006 आप मे और आपके
आप मे और आपके भगवान में कोई अंतर नहीं,
न आप खुद को धोखा दे सकते हैं न भगवान को।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-006
12.6.21
Q- 010 तकलीफों को
S- 016 इस ग़म को
Q- 009 मुहब्बत में कुर्बान
मुहब्बत में कुर्बान हो या न हो कोई,
कुर्बानी की कुछ तैयारी सी तो लगे।
अल्फ़ाज़ से मीज़ान लगे ,या नहीं,
'अजनबी' को कुछ गर्मजोशी तो लगे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-009
11.6.21
S-015 तामीरे-ख्वाब में
तामीरे-ख्वाब में भी पाए धोखे "अजनबी"
ये तामीर उसकी नहीं जो ख्वाब मैने देखा था।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-015
9.6.21
S-014 हौंसले देखिए
मंसूबे देखिए मुख़ालिबों के कितना इसरार कर रहे हैं,
फ़नाह हो चुके हैं मगर दफ़्न होने से इनकार कर रहे हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-014
S-013 मैं तो पीता हूँ
8.6.21
S- 012 ग़मों की आमद
6.6.21
S-011 छुपा सका है
5.6.21
S- 010 मेरे 'अपने' हर हाल में
मेरी मुस्कुराहट में भी मेरा दर्द पहचान लेते हैं।
K-007 सूरज को मैं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
-
चार दिन में ही वापस आ धमके मेरे तमाम ग़म, बड़ा शौक सा चरमराया था मुझे ख़ुश रहने का। -वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-276
-
बुझे चराग़ का यह धुआं बता रहा है, अभी अभी ख़त्म हुई है दास्ताँ कोई, तन्हाई में लिपटा सन्नाटा जता रहा है, अभी अभी यहाँ से गुज़रा है तूफ़ां क...
-
कोई शिकायत न रही ज़माने से। जब से रु-ब-रु हुए हैं आयने से। -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-233