रहने दो यार बखान हुस्नवालों का,
कभी इनके किरदार पर भी बोला करो।
ढहाते हैं ये ज़ुल्म जिन कद्रदानों पर,
कभी उनके दर्दे-सब्र को भी टटोला करो।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-011
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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