16.6.21

S-017 यूं तो चिराग़ हूँ

यूं तो चिराग़ हूँ, पर बुझा-बुझा सा रहता हूँ मैं,
अंधेरे हावी हैं मुझ पर, डरा-डरा सा रहता हूँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-017

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...