तकलीफ़ों को याद रखते हैं, राहतों को भूल जाते हैं,
नफ़रतों को याद रखते हैं, मुहब्बतों को भूल जाते हैं,
बहुत बढ़ती जा रही है नाबर्दाश्तगी इस ज़माने में,
लोग मुख़ाल्फ़तें याद रखते हैं हिमायतों को भूल जाते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-010
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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