8.6.21

S- 012 ग़मों की आमद

ग़मों की आमद-ओ-रफ़्त से यू  न मायूस हो जाया कीजे,
खुशियों  की भी तो आदत है, जाकर लौट आने की।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-012

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...