ऐ वक्त तुझे तो आदत सी हो गई है सितम ढाने की,
कभी आदमी भी देख लिया कर ज़ुल्म ढाने से पहले।
कभी आदमी भी देख लिया कर ज़ुल्म ढाने से पहले।
कभी बुरा बन के आता है तो कभी अच्छा बनके तू,
कभी तो कुछ बतला दिया कर, अपने आने से पहले।
कितने ही बेकसूर चुप बैठ जाते हैं तेरी मार खाकर,
ये तो दोहरी मार है, पूछ क्यों नहीं लेता मारने से पहले।
खुदभी बदल जाता है और बदल देता है इंसानों को तू,
आपस मे लड़ने लगते हैं लोग सच्चाई जानने से पहले।
जाने कब वफ़ादार, जाने कब बेवफ़ा हो जाता है तू,
काश इंसाँ तूझे पहचान लिया करता तेरे आने से पहले।
कभी तो झट बदल जाता है, कभी बदलता ही नहीं तू,
लोग बेमौत मर जाते हैं तेरे मिज़ाज़ को जानने से पहले।
ये माना कि हर शय है तेरी गुलाम इस ज़माने में,
फिर मौत क्यूं आ जाती है इंसाँ को तेरे आने से पहले।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-001
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