बेशक ज़माना भी बन जाता है दुश्मन कभी-कभी,
कुछ लोग भी हैं जो ज़माने को दुश्मन बना लेते हैं।
रखते हैं तल्खियाँ भी, तमाम तवक्को भी ज़माने से,
पर इसी पे इल्ज़ाम, इसी पे तोहमतें वो लगा देते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-013
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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