उन रिश्तों के टूटने का क्या ग़म, जो कभी ख़ास नहीं थे।
उनसे दूर होना भी क्या दूर होना, जो कभी पास नहीं थे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-315
उनसे दूर होना भी क्या दूर होना, जो कभी पास नहीं थे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-315
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
आज है कल न होगा,
कुछ मुस्तक़िल नहीं है।
ख़त्म तो होगी ये भी,
कहानी तो कहानी है।
किसी का आंसू, आंसू,
और का आंसू पानी है।
क्यों संभालें यादें भी,
यहां सब तो बेमानी है।
अजनबी रहना है ठीक,
दोस्त होना नादानी है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-020
ख़ुदको गुनेहगार अब मान भी ले "अजनबी",
बेगुनाह साबित होने में तो सदियां लग जाएंगी।
कैसे कैसे दुनियाँ में करिश्मे हो गए,
जो थे गुनहगार वो फ़रिश्ते हो गए।
गुस्ताखियाँ करते हैं महज़ चंद लोग,
पर बदनाम पाक साफ रिश्ते हो गए।
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...