29.3.24

S-315 उन रिश्तों के

उन रिश्तों के टूटने का क्या ग़म, जो कभी ख़ास नहीं थे।
उनसे दूर होना भी क्या दूर होना, जो कभी पास नहीं थे। 
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-315

28.3.24

P-242 दुआ करता हूँ

दुआ करता हूँ  अल्लाह तुझे तौफ़ीक़ दे, 
मैं न करूंगा गाली गुफ़्तार, मैं रोज़े से हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-242

Q-161 ज़ख़्म लग जाता है

ज़ख़्म लग जाता है तो भर भी जाता है।
हर कमी को  कोई पूरा कर ही जाता है।
क्यों रोकता है जाने वाले को "अजनबी",
किसी के बग़ैर  कोई मर नहीं जाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-161

G-021 फ़िज़ूल रवायतों

फ़िज़ूल रवायतों से तंग ना होंगे हम,
अब रस्मे-दोस्ती को भी तोड़ देंगे हम।

हमेशा ही पछताए हैं, शर्मिंदा हुए हैं,
अब और ना जज़्बात को पालेंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से..................

हमें कोसता है ज़माना तो कोस ले,
बहुत हुआ, अब एक ना सुनेंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से..................

बहुत जी लिए हम औरों के लिए,
अब ख़ुद के लिए भी जिएंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से.................

ख़ास फ़र्क नहीं अपनों और ग़ैरों में,
अब ख़ुदको ग़ैरों में गिना करेंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से.................

दोस्त होकर भी अजनबी बन गए,
तो अब "अजनबी" ही बने रहेंगे हम।

-(वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-021

27.3.24

Q-160 मुहब्बत रफ़्ता-रफ़्ता

मुहब्बत रफ़्ता-रफ़्ता बढ़ती जाती है।
पर मंज़िल दूर-दूर खिसकती जाती है।
सफ़र ख़त्म होता ही नहीं "अजनबी"
ज़िन्दगी जुस्तजू में गुज़रती जाती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-160

20.3.24

G-020 सब कुछ बस

सब कुछ बस यूंही है।
कल था आज नहीं है।

आज है कल न होगा,

कुछ मुस्तक़िल नहीं है।


ख़त्म तो होगी ये भी,

कहानी तो कहानी है।


किसी का आंसू, आंसू,

और का आंसू पानी है।


क्यों संभालें यादें भी,

यहां सब तो बेमानी है।


अजनबी रहना है ठीक,

दोस्त होना नादानी है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  G-020




19.3.24

M-087 मैं जानता हूँ

मैं जानता हूँ तुम्हारी दिक्कतेँ,
चलो मैं अपनी दिक्कत भूल जाता हूँ।
तुम भुला चुके मुझे पहले ही,
चलो मैं भी तुमको अब भूल जाता हूँ।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" M-087


P-241 फिर नहीं जुड़ता

फिर नहीं जुड़ता वो दिल जो टूट कर बिखर  जाता है,
कितना भी जोड़ो उसे बाल भर का निशां रह जाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-2
41

P-240 खोल कर रख दरवाज़ा

खोल कर रख दरवाज़ा ऐ "अजनबी",
'"उसको" दस्तक देने की आदत नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-240

16.3.24

P-239 जब जब सुंदर

जब जब सुंदर सुहाने पल आए हैं।
अपनों ने ही राहों में कांटे बिछाए हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-239

P-238 ख़ुदको गुनहगार

ख़ुदको गुनेहगार अब मान भी ले "अजनबी",

बेगुनाह साबित होने में तो सदियां लग जाएंगी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-238

S-314 कुछ दूरियां भी

कुछ दूरियां भी थीं लाज़िम "अजनबी",
अंजामे-बेपनाह मुहब्बत भी अच्छा नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-314

13.3.24

Q-159 तेरे हमनामों हमशक्लों

तेरे हमनामो, हमशक्लों से भी है उनसियत,
इस कदर तूने हमको दीवाना बना रक्खा है।
छुड़ाले दामन बेशक, उफ़्फ़ भी न करेंगे हम,
दिल को हमने कब से पत्थर बना रक्खा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-159
 


P-237 जब मर्ज़ी आए पलकों

जब मर्ज़ी आए पलकों पर बैठा लेते हैं, जब चाहे गिरा देते हैं,
बड़ी आज़ाद-तबियत के हैं लोग, मन माफ़िक उसूल बना लेते हैं। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-237

12.3.24

M-086 हर खुशी मेरे पास

हर ख़ुशी मेरे पास है,
फिर क्यों दिल उदास है।
बुझाए बुझती भी नहीं,
जाने कौनसी ये प्यास है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-086



M-085 कुछ भी हो उसे मैं

कुछ भी हो उसे मैं भुला ना पाऊंगा,
भुलाऊंगा तो खुद ही खो जाऊंगा,
उसी पर तो मेरे सारे पासवर्ड बने हैं,
उसे भुलाके कहीं का न रह जाऊंगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-085

5.3.24

S-313 मैं भी 'अपनों' को

मैं भी 'अपनों' को जलाने लगा हूँ,
यूंही झूंठमूठ को मुस्कुराने लगा हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-313

3.3.24

S-312 तमाम गुनहगारों ने

तमाम गुनहगारों ने हमें सुना  दी है सज़ा, 
"हमारा जुर्म शराफ़त है, क्या किया जाये,"
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-312

2.3.24

Q-158 उसी पर गुस्सा

उसी पर गुस्सा, उसी पर प्यार आ जाए,
वो कमज़ोरी है हमारी क्या किया जाए।
हर नज़ारे में हमें दीखता है बस वही एक,
आंखों में मूरत उसी की है क्या किया जाए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-158

1.3.24

S-311क्यों कहते हैं लोग

क्यों कहते हैं लोग कि मैं शायर मशहूर हूँ।
मैं तो बेख़ुदी में हूँ मुब्तला, ख़ुद ही से दूर हूँ।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-311



S-310 एक चीज़ मौत ही

एक चीज़ मौत ही तो वाबस्ता है ज़िन्दगी से,
वरना तो "अजनबी" इसमे रक्खा ही क्या है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-310

Q-157 कैसे कैसे दुनियाँ

कैसे कैसे दुनियाँ में करिश्मे हो गए,

जो थे गुनहगार वो फ़रिश्ते हो गए।

गुस्ताखियाँ करते हैं महज़ चंद लोग,

पर बदनाम पाक साफ रिश्ते हो गए।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-157

S-309 दौर-ए- मुफलिसी

दौर-ए-मुफ़लिसी में भी अमीर हैं हम,
जीस्त में हम ऐसे दोस्त एहबाब ले आए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-309

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...