16.3.24

S-314 कुछ दूरियां भी

कुछ दूरियां भी थीं लाज़िम "अजनबी",
अंजामे-बेपनाह मुहब्बत भी अच्छा नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-314

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...