फ़िज़ूल रवायतों से तंग ना होंगे हम,
अब रस्मे-दोस्ती को भी तोड़ देंगे हम।
अब रस्मे-दोस्ती को भी तोड़ देंगे हम।
हमेशा ही पछताए हैं, शर्मिंदा हुए हैं,
अब और ना जज़्बात को पालेंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से..................
हमें कोसता है ज़माना तो कोस ले,
बहुत हुआ, अब एक ना सुनेंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से..................
बहुत जी लिए हम औरों के लिए,
अब ख़ुद के लिए भी जिएंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से.................
ख़ास फ़र्क नहीं अपनों और ग़ैरों में,
अब ख़ुदको ग़ैरों में गिना करेंगे हम।
--फ़िज़ूल रवायतों से.................
दोस्त होकर भी अजनबी बन गए,
तो अब "अजनबी" ही बने रहेंगे हम।
-(वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-021
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