मुहब्बत रफ़्ता-रफ़्ता बढ़ती जाती है।
पर मंज़िल दूर-दूर खिसकती जाती है।
सफ़र ख़त्म होता ही नहीं "अजनबी"
ज़िन्दगी जुस्तजू में गुज़रती जाती है।
पर मंज़िल दूर-दूर खिसकती जाती है।
सफ़र ख़त्म होता ही नहीं "अजनबी"
ज़िन्दगी जुस्तजू में गुज़रती जाती है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-160
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