एक चीज़ मौत ही तो वाबस्ता है ज़िन्दगी से,
वरना तो "अजनबी" इसमे रक्खा ही क्या है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-310
वरना तो "अजनबी" इसमे रक्खा ही क्या है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-310
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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