27.2.24

K-016 बन्द होठों में

बंद होठों में भी मंद-मंद मुस्कान है दीखे,
खुले होठों के बीच श्वेत मोती से हैं दीखे।
नयनों की चमक कशिश अविस्मरणीय,
जो देखे, उसे जहाँ में कुछ और न दीखे।

ईर्ष्या होती है तुम्हारी घनेरी ज़ुल्फ़ों से,

सरकते सरकते कहाँ तक आ पहुंचती हैं।

हवा के झोंके नर्म गालों को जब सहलाएं,

बंधन मुक्त होके ये ज़ुल्फ़ सर्वत्र विचरती हैं।


क्यों छुपाए फिरती हो रूप की दौलत,

गर्म वस्त्रों से,इतने सारे भारी भरकम से।

तुम तो ख़ुद ही हो ऊष्मा,ऊर्जा, बला की,

क्यों डरती रहती भला सर्दी के मौसम से।


पहन लेतीं जब तुम परिधान नीला सा,

तो जैसे हो जाता है आकाश नीला सा,

धारण कर लो जब तुम वस्त्र पीला सा,

बेचारा बसंत हो जाता कुछ शर्मिला सा।


कपोल लाल-लाल, नाजुक अधर लाल,

माथे पर बिंदी लाल बदन पे शाल लाल, 

हल्की हल्की लालिमा मुख मंडल पर,

जैसे शर्म के मारे बेचारे गाल लाल-लाल।

(-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-016)







26.2.24

P-236 काश, रिश्ते ख्वाबों

काश, रिश्ते ख्वाबों में ही रहा करते,
टूट जाने पर ख़ास ग़म न हुआ करते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-236

T-035 बस एक ही शख्स

बस एक ही शख्स दुनियाँ से था अलग,
पर बेचारा वो भी कब तक रहता अलग, 
अब वो भी दुनियाँ में शामिल हो गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-035

19.2.24

Q-156 शायरी जीने का वसीला

शायरी जीने का वसीला न बन गई होती,
'वो' अगर  मुझसे बेवफ़ा न बन गई होती।
ज़ख्म दर्दे-जुदाई के ख़ामोश ही रह जाते,
मेरी शायरी अगर शिफ़ा न बन गई होती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-156

18.2.24

Q-155 राहे-मुहब्बत में

राहे-मुहब्बत में अब होना है जो  होने दो,
उड़ती हैं धज्जियां उसूलों की तो उड़ने दो।
कब दिया है साथ ज़माने ने जो अब देगा,
ख़ाक़ में मिलता है ज़माना तो मिलने दो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-155


17.2.24

S-308 दिल का गुबार

दिल का गुबार दिल मे इकट्ठा कर रक्खा है,
निकालूं मैं कैसे उसने जो मना कर रक्खा है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-308

Q-154 जो ज़्यादा ही चीख़ते

जो ज़्यादा ही चीख़ते और चिल्लाते हैं,
आज वही बेगुनाह मान लिए जाते हैं।
मगर यह भी हक़ीक़त है "अजनबी",
सिर्फ़ ख़ामोश ही दफ़्न किए जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-154

K-015 मेरे खुले विचार

मेरे खुले विचार, खुला शरीर है,
मेरी है मर्ज़ी ,  यह मेरा शरीर है,
इसको दिखाऊँ,   या छुपाऊं मैं,
मैं ढक कर रखूं,  या रक्खूँ नंगा,
किसी को क्या   ये मेरा शरीर है।

परन्तु तुम मर्द आंखें मीचे रखो,

नारी-सम्मान सदा बना के रखो,

कामुकता चाहे मारे उछाल पर,

बस  तुम उसको  दबा के रखो।


- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-015

16.2.24

Q-153 कोई हस्ती कितनी

कोई हस्ती कितनी बड़ी क्यों न हो,
वो भी एक दिन मिट जाया करती है।
ज़िन्दगी कितनी मुश्किल क्यों न हो,
वो भी जैसे तैसे कट जाया करती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-153

S-307 चीख़ने चिल्लाने

चीख़ने चिल्लाने से कोई बेगुनाह नहीं हो जाता।
कोसने से कोई मुख़ालिब फ़नाह नहीं हो जाता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-307

14.2.24

M-084 नीले आसमान से उगता

नीले आसमान से उगता सा गुलाबी चेहरा,
चेहरे पर अंकित होतीं हल्की सी ललिमाएँ।
आकार ले रही उसकी एक तस्वीर ज़हन में,
आच्छादित हों जब केशों की काली घटाएं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-084

M-083 जीवन मे,

जीवन मे, जितने भी लोग आते हैं,
कुछ न कुछ, ज़रूर सिखा जाते हैं,
हमारी आंखें तो रह जातीं मुंदी हुई,  
वही तो हैं जो दुनियां दिखा जाते हैं

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-083

13.2.24

S-306 मैंने बचाकर रक्खी है

मैंने बचा कर रक्खी है ये दाद देने को तेरी ग़ज़ल पर,
कैसे कहूँ कितनी दाद तो मुझसे तेरे हमनाम ले जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-306

S-305 कैसी भी ज़िन्दगी

कैसी भी ज़िन्दगी आसाँ लगने लगती है
जब उसका जीना बन जाए एक मजबूरी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-305

11.2.24

Q-152 भला कौन रोक पाए है

भला कौन रोक पाया है परिंदों एक ही जगह,
पंख हैं तो उड़ेंगे ही एक जगह से दूसरी जगह,
कोई आसमाँ कर रहा होता है इंतज़ार उनका,
कैदे-कफ़स में भी फड़फड़ाएंगे अपनी जगह।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-152

10.2.24

S-304 जिसके होंठ ही

जिसके होंठ ही देते हों मात सभी गुलाबों को,
उसे मैं एक मामूली सा गुलाब देना नहीं चाहता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-304

S-303 बन्द कर दे झूंट मूठ

बन्द कर दे झूंटमूठ का ख़ुश होना "अजनबी",
अब चन्दरोज़ा ख़ुशियों में ग़म झलकने लगा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-303

9.2.24

S-302 मुद्दतों तक न भूलेंगे

मुद्दतों तक न भूलेंगे तेरी नज़रंदाज़ियों को हम,
बाख़ूबी जान गए हैं तेरी 'मसरूफ़ियतों को हम। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-302


1.2.24

Q-151 कुछ ख़ुशियाँ अगर

कुछ ख़ुशियां अगर ख़रीद भी लें,
तो बाद में कीमत चुकानी मुश्किल होती है।
रख दें अगर गैरत कहीं गिरवी में,
तो फिर वापस छुड़ानी मुश्किल होती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-151

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...