मेरे खुले विचार, खुला शरीर है,
मेरी है मर्ज़ी , यह मेरा शरीर है,
इसको दिखाऊँ, या छुपाऊं मैं,
मैं ढक कर रखूं, या रक्खूँ नंगा,
किसी को क्या ये मेरा शरीर है।
मेरी है मर्ज़ी , यह मेरा शरीर है,
इसको दिखाऊँ, या छुपाऊं मैं,
मैं ढक कर रखूं, या रक्खूँ नंगा,
किसी को क्या ये मेरा शरीर है।
परन्तु तुम मर्द आंखें मीचे रखो,
नारी-सम्मान सदा बना के रखो,
कामुकता चाहे मारे उछाल पर,
बस तुम उसको दबा के रखो।
- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-015
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