17.2.24

K-015 मेरे खुले विचार

मेरे खुले विचार, खुला शरीर है,
मेरी है मर्ज़ी ,  यह मेरा शरीर है,
इसको दिखाऊँ,   या छुपाऊं मैं,
मैं ढक कर रखूं,  या रक्खूँ नंगा,
किसी को क्या   ये मेरा शरीर है।

परन्तु तुम मर्द आंखें मीचे रखो,

नारी-सम्मान सदा बना के रखो,

कामुकता चाहे मारे उछाल पर,

बस  तुम उसको  दबा के रखो।


- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-015

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