19.2.24

Q-156 शायरी जीने का वसीला

शायरी जीने का वसीला न बन गई होती,
'वो' अगर  मुझसे बेवफ़ा न बन गई होती।
ज़ख्म दर्दे-जुदाई के ख़ामोश ही रह जाते,
मेरी शायरी अगर शिफ़ा न बन गई होती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-156

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