शायरी जीने का वसीला न बन गई होती,
'वो' अगर मुझसे बेवफ़ा न बन गई होती।
ज़ख्म दर्दे-जुदाई के ख़ामोश ही रह जाते,
मेरी शायरी अगर शिफ़ा न बन गई होती।
'वो' अगर मुझसे बेवफ़ा न बन गई होती।
ज़ख्म दर्दे-जुदाई के ख़ामोश ही रह जाते,
मेरी शायरी अगर शिफ़ा न बन गई होती।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-156
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