17.2.24

S-308 दिल का गुबार

दिल का गुबार दिल मे इकट्ठा कर रक्खा है,
निकालूं मैं कैसे उसने जो मना कर रक्खा है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-308

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